में कौन हुँ ?

ना में अन्त हु ना आगाझ हू , में तो बस वो बिखरे सपने की टूटी हुई आवाझ हू ।

ना धुन्ध्ना तू मजे घनी , कली, बेह्की हुई सी रात के आसमान में , में तो बस वो गुन्गुनी धूप का एहसास हुँ ।

ना हुँ में शन्ति की मूरत , ना हुँ में सभ्यता की सुरत , में तो बस वो झिन्द्गी के सन्दूक में पडा हुआ पुराना सा लिबाझ हुँ ।

कही नही मिलुन्गी में येह आतिफ और मिका के गानो में , में तो वो लाता जी का छेडा हुआ एक खूबसुरत साझ हुँ ।

नही हुँ में किसीकी झीन्द्गी में उजाला लाने वाला प्रकाश , में हुँ वो कभी ना बताया जने वाला राझ ।

में नही हुँ कल्के अखबार का किस्सा , में हुँ वो प्यारे से बाच्पन की धुंधली सी याद ।

में द्रौपदी नही महाभारत की , में उस उपमान का परिणाम हुँ ।

में कय्कै का स्वार्थ नही मीरा का प्रेम हुँ ।

खोजना मत मुजे लव्झो के गहरे समन्दर में , में तो वो छु के निकल जाने वाला हवा का झोका हुँ ।

में इबादत भी हुँ में इकरार भी हुँ ।

क्युकी में वो नही जिसका शब्दो में झिक्र हो, में तो वो ना बयां कर पाने वाला जस्बात हुँ ।

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